कविता समाज की सामूहिक चेतना की आवाज़ होती है। वह समय का दस्तावेज़ भी होती है और समय से टकराने का साहस भी। लेकिन आज के कवि सम्मेलनों, साहित्यिक आयोजनों और तथाकथित सांस्कृतिक मंचों को देखकर एक असहज प्रश्न उठता है—क्या कविता अपने मूल जन-सरोकार से भटक चुकी है?
आज अधिकांश मंचों पर दृश्य लगभग एक जैसा है। मंच पर कवि हैं और सामने बैठे श्रोता भी अधिकतर कवि ही। कवि एक-दूसरे को बुलाते हैं, कवि ही एक-दूसरे की किताबें खरीदते हैं और सम्मान भी आपस में बाँट लिए जाते हैं। आयोजक, अतिथि, निर्णायक और प्रशंसक—सब एक ही बंद वृत्त का हिस्सा बन चुके हैं। यह साहित्यिक लोकतंत्र नहीं, बल्कि आत्ममुग्धता का एक सीमित संसार है, जिसमें आम समाज की उपस्थिति लगभग न के बराबर है।
यह प्रश्न अनिवार्य है कि कविता आखिर किसके लिए है?
क्या कविता केवल कवियों के लिए लिखी जा रही है या समाज के लिए?
यदि कविता का पाठक वही है जो स्वयं कविता लिख रहा है, तो यह संवाद नहीं, आत्मसंवाद है।
इतिहास गवाह है कि जब साहित्य अपने सामाजिक सरोकार खो देता है, तब वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाता है। कविता का जन्म कभी वातानुकूलित सभागारों में नहीं हुआ। वह खेतों की मिट्टी, मज़दूर के पसीने, स्त्री की चुप्पी, दलित के अपमान और आम आदमी की पीड़ा से उपजी थी। जिन कवियों की रचनाएँ आज भी जीवित हैं, वे इसलिए नहीं कि उन्हें मंच मिले, बल्कि इसलिए कि उनकी कविता ने सत्ता से सवाल किए और हाशिये की आवाज़ बनी।
आज का संकट यह है कि कविता का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के निकट, संस्थागत सुरक्षा में और आपसी प्रशस्ति में उलझा हुआ दिखाई देता है। सोशल मीडिया पर मुस्कुराते चेहरे, शॉल, स्मृति-चिह्न और प्रशस्ति-पत्र—लेकिन सवाल यह नहीं कि सम्मान गलत है, सवाल यह है कि सम्मान का आधार क्या है?
क्या वह रचना, जिसने समाज में हलचल पैदा की, या फिर नेटवर्किंग और समीकरण?
धीरे-धीरे कविता भी एक तरह की ब्रांडिंग बनती जा रही है। कवि की पहचान उसकी कविता से कम और उसकी मंच-उपस्थिति, आयोजनों और तस्वीरों से ज़्यादा होने लगी है। जब कवि अपनी कविता से ज़्यादा अपने ‘प्रेज़ेंस’ पर ध्यान देने लगता है, तब कविता आत्मप्रचार का माध्यम बन जाती है—और यहीं से उसका पतन शुरू होता है।
एक और गंभीर प्रश्न पाठक का है। आम पाठक कविता से दूर क्यों हो रहा है? इसका उत्तर केवल पाठक की अरुचि में नहीं, बल्कि कविता की बदलती प्रकृति में भी छिपा है। जब कविता आम जीवन की भाषा, संघर्ष और सवालों से कट जाती है, तब वह एक बौद्धिक अभ्यास बनकर रह जाती है। परिणामस्वरूप कविता समाज से कटकर मंचों तक सीमित हो जाती है।
कवि का दायित्व केवल सौंदर्य रचना नहीं, बल्कि सत्य के पक्ष में खड़ा होना भी है। कविता का काम सत्ता को सहज बनाना नहीं, बल्कि उसे असहज करना है। लेकिन आज कई कवि सत्ता से टकराने के बजाय उसके अनुकूल रचना करना अधिक सुरक्षित समझते हैं। यह सुरक्षा कविता की आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर देती है।
सम्मेलन संस्कृति पर गंभीर आत्ममंथन की ज़रूरत है।
क्या हमें इतने अधिक कवि सम्मेलन चाहिए, या कविता को समाज तक ले जाने के नए रास्ते खोजने चाहिए?
क्या कविता केवल मंच पर पढ़े जाने की वस्तु है, या वह स्कूलों, कॉलेजों, गाँवों, मज़दूर बस्तियों और आंदोलनों तक पहुँचनी चाहिए?
कई बार ‘सरोकार’ भी एक फैशन बन जाता है। मंचों पर स्त्री, दलित और हाशिये की बात होती है, लेकिन वह अक्सर प्रतीकात्मक रह जाती है। कविता तब तक जीवित नहीं रह सकती, जब तक वह जोखिम उठाने का साहस न करे—सामाजिक भी और वैचारिक भी।
कविता का यह संकट केवल कवियों का संकट नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना का संकट है। जब साहित्य आत्मालोचना छोड़ देता है, तब वह सजावट बन जाता है। और जब सजावट ही उद्देश्य बन जाए, तब सवाल, संघर्ष और परिवर्तन की संभावना समाप्त हो जाती है।
आज ज़रूरत है कि कवि स्वयं से पूछें—
वे क्यों लिख रहे हैं?
सम्मान के लिए, मंच के लिए, या समाज के लिए?
कविता का मूल्य तालियों, प्रमाण-पत्रों और तस्वीरों से नहीं आँका जाता। उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि वह किसके पक्ष में खड़ी है और किससे सवाल कर रही है।
अंततः कविता का भविष्य इसी पर निर्भर करता है कि वह आत्ममुग्ध मंचों से बाहर निकलकर फिर से जीवन की धूल में उतरने का साहस करती है या नहीं। यदि कविता समाज की धड़कन से कट गई, तो वह संग्रहालय की वस्तु बन जाएगी—सुंदर, पर निष्प्राण।
कविता को जीवित रखने के लिए कवि को जीवित समाज से जुड़ना होगा। यही उसका धर्म है, यही उसकी सार्थकता।

डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।
